'ऋतंभरा प्रज्ञा'  


अब आपको यह नहीं सोचना पड़ता कि मुझे अवश्य चित्त केंद्रित करना है, ठीक है अब मै ये विचार नही आने दूंगा, अब मुझे इस विषय में सोचना है। यह स्वतः ही हो जाता है । आप कोई भी पुस्तक पढ़े आप तुंरत खोज लेंगे कि सहजयोग के हित में क्या है। कोई पुस्तक अगर परमात्मा विरोधी होगी तोह आप उसे त्याग देंगे। अब जो अवस्था आपके अंदर जागृत हुई है यह मस्तिष्क की एक नई अवस्था है। संस्कृत भाषा में इसका बहुत सुंदर नाम है, 'ऋतंभरा प्रज्ञा', एक अति कठिन नाम। ऋतंभरा प्रकृति का नाम है। व्यक्ति को लगता है की पूर्ण प्रकृति ही ज्योतिर्मय हो उठी है।


मै एक उदहारण दूंगी। बच्चे के जन्म पूर्व स्वतः ही माँ के स्तनों में दूध आ जाता है। प्रकृति अपने आप बच्चे के जन्म के लिए कार्य करती है। इसी प्रकार जब ऋतंभरा प्रज्ञा सहजयोगियों के लिए कार्य करने लगती है तो आप हैरान हो जाते है की अचानक किस प्रकार कार्य हो गए।


तो ऋतंभरा प्रज्ञा ने आपके हित में कार्य करना आरम्भ कर दिया है। आप सभी मुझे बताते है की श्री माताजी यह चमत्कार हुआ, वह घटना हुई। और हम नही जानते की ये सब किस प्रकार घटित हुआ! मै आपको एक उदहारण दूंगी। कल हम सीमेंट का कोई कार्य करवा रहे थे और इटली के उस लड़के ने कहा कि इसके लिए दो बोरी सीमेंट कि आवश्यकता होगी। मैंने कहा "आप काम को चालू रखो, सीमेंट समाप्त नही hoga"। मेरे जाने से पूर्व तक काम चालू था और सीमेंट समाप्त नही हुआ था। अब आप कल्पना करें के सीमेंट जैसी जड़ वस्तु भी यह सब जानती है।


तो आपकी अवस्था ही विशिष्ट है - वह अवस्था जिसमें आपकी एकाकारिता प्रकृति से है और प्रकृति कि एकाकारिता आपसे। तो परमात्मा भिन्न घटनाओं, कार्यों, प्रेम, सुरक्षा तथा आपके प्रति परमेश्वरी चिंता द्वारा स्वयं - प्रकृति के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति कर रहे है। और यह अनंत है। यह घटित होता है और लोग समझ भी नही पते के कैसे! परन्तु यही तो समाधी अवस्था है.




परन्तु कुछ ऐसे भी लोग होते है जिनसे मै यदि कहूँ कि "क्या आप यह कार्य करेंगे?" , "नहीं श्री माताजी दुकान बंद हो गई होगी।" वो मेरा बताया गया कार्य नही करेंगे। ऐसा करना ठीक नहीं है। ये लोग ऐसे ही चलते रहेंगे। कुछ ऐसे भी लोग है जो कहते है कि जब श्री माताजी ने कोई कार्य करने को कहा है तो हम दुकान को देख तो लें। इस प्रकार के हजारो उदहारण है। आज कुछ सहजयोगी पलंग को खिसकाने का प्रयत्न कर रहे थे। मैंने कहा, "ठीक है, मै इसे धकेलती हूँ।" उस पर मैंने केवल अपनी नाभि से चित्त डाला॥ किसी चीज़ को धकेला नहीं। और वह पलंग खिसक गया। ऋतंभरा प्रज्ञा के कारण। यह सहायता चमत्कार आदि कुछ नहीं है। परमात्मा में अपना प्रेम अभिव्यक्त करके यह दर्शाने की शक्ति विद्यमान है। आप संत है और परमात्मा द्वारा चुने गए है। परन्तु इसके लिए पहले आपको वह स्थिति स्वीकार करनी होगी। परन्तु यदि आप अन्य लोगों की तरह से व्यवहार करते रहे - हे परमात्मा दुकाने बंद है, वह व्यक्ति बड़ा कठिन है, मै नहीं सोचता कि यह कार्य होगा - तो ये कभी नही होगा। आपको समझ लेना होगा कि आप संत है, परमात्मा द्वारा चुने गए हैं और मैंने - साकार एवं निराकार में - आपको पुनर्जन्म दिया है।


- श्री माताजी निर्मला देवी

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1 प्रतिक्रिया: to “ 'ऋतंभरा प्रज्ञा'

  • clpatel
    October 12, 2008 at 12:37 PM  

    अनंत काल से संसार में जो भी कार्य होते रहे हैं वो सब परमेश्वर की सर्वव्यापी शक्ति ही करती रही है।
    ऋतु के अनुसार प्रकृति का स्वरूप बदलता रहता है।
    यह सब स्वचालित है। कौन से पेड़ में कैसा फूल खिलेगा और कैसा फल लगेगा यह सब ऋतंभरा-प्रज्ञा का ही कार्य है । आधुनिक विज्ञान के समझ से परे है। आज उसी शक्ति का अनुभव सहजयोगी कर रहे हैं। यह उत्क्राँति का चरमोत्कर्ष है।
    माँ का यह दिव्यप्रेम है।

श्री माताजी निर्मला देवी