सहजयोगी की असीमित चित्त-शक्ति  


सहजयोगी होने के नाते अब आप शक्तिशाली हस्तियां हैं। आप बहुत शक्तिशाली लोग हैं। पुरे विश्व में समस्याएं हैं आप अच्छी तरह से जानते हैं। आपका बुद्धिवादी या राजनितिज्ञ होना आवश्यक नहीं। परन्तु विश्व को परेशान करने वाली समस्याओं का ज्ञान आपको होना आवश्यक हैं। संत होने कि अपनी मस्ती में आपको नही खो जाना हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। आपको समझना है कि आपने इसी विश्व में रहना है। विश्व कि सारी समस्याओं को आपने जानना हैं। केवल अपनी समस्याओं कि ही नहीं, पूरे विश्व कि समस्याओ कि चिंता आपने करनी हैं। आपको विचारना है कि विश्व में क्या हो रहा है और विश्व कि क्या समस्याएं हैं? यह आपकी जिम्मेदारी है।


मात्र इतना ही नहीं, आपको प्रार्थना करनी है कि श्री माताजी इस समस्या का समाधान कीजिये। व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से आपको अपना चित्त स्वयं से और अपने क्षुद्र जीवन से हटा कर इस विशाल लक्ष कि ओर लाना है। तब आप संत हैं। आपका कर्तव्य है कि इन समस्याओं के समाधान के लिए परमात्मा कि सहायता मांगें। इसी कार्य के लिए आपको चुना गया है। आपकी इच्छा पूर्ण होगी। आप जानते हैं कि मै तो इच्छा-विहीन हूँ। आप ही को यह इच्छा करनी है। जो भी इच्छा आप करेंगे वह पूर्ण होगी। माँ कि सुरक्षा, प्रेम तथा करुणा आपके साथ हैं। परन्तु आपको इस विश्व कि चिंता करनी होगी. सीमित क्षेत्र में, सीमित ढंग से नहीं जीना होगा। अब जैसे इंग्लैंड के लोग सोचते हैं कि उनकी समस्याएं बर्तानिया तक ही सीमित हैं। नहीं, जहाँ तक सहजयोग है वहां तक आपकी समस्याएं हैं। और आपको उन सब कि चिंता करनी होगी। ऑस्ट्रेलिया में भी वैसी ही समस्याएं हैं। कोई व्यक्ति कष्टदायी है आपको चाहिए कि उस व्यक्ति को ठीक कर दें। ऑस्ट्रेलिया में हो, अमेरिका में या भारत में, मैं सब ठीक करुँगी।


आपको अपने चित्त का विस्तार बाहर कि ओर करना होगा, अंदर कि ओर नही। केवल अपनी, अपने परिवार, घर तथा बच्चों कि ही चिंता नहीं करनी। बाहर कि ओर चित्त विस्तृत करते ही आपकी व्यक्तिगत समस्याएं सुलझ जाती हैं। आपको बाहर चित्त डालना है।


एक बार आप अपने व्यक्तित्व को समझ लें। व्यक्तित्व एक सीमित क्षेत्र में लिप्त नही हो सकता। आपका व्यक्तित्व पूरे ब्रम्हांड कि समस्याओं से लिप्त हो जाना चाहिए। आप आश्चर्यचकित होंगें कि सामूहिक रूप से सभी कुछ हो सकता है।


- श्री माताजी निर्मला देवी (६/८/१९८८ शुडी कैंप, इंग्लैंड। )


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1 प्रतिक्रिया: to “ सहजयोगी की असीमित चित्त-शक्ति

  • Pankaj Sharma
    September 17, 2008 at 10:20 PM  

    आपको अपने चित्त का विस्तार बाहर कि ओर करना होगा, अंदर कि ओर नही।

    beautiful didi , gr8 efforts by you
    May Shri Maa bless you

श्री माताजी निर्मला देवी