आत्म-साक्षात्कार
Courtesy - SITA
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Posted in आत्म-साक्षात्कार, सहजयोग by Pankaj Sharma | 0 प्रतिक्रिया
सहज योग में जब आप आत्मा बन जाते हैं तब सभी कुछ बदल जाता हैं। आप एक ऐसे मनुष्य बन जाते हैं जो जानता हैं की प्रसन्नता क्या होती है, प्रसन्नता का आनंद कैसे लिया जा सकता है, जीवन का आनंद कैसे लिया जाए -और जो दूसरों को खुशी देता है-सदैव यह सोचता रहता है कि दूसरों को कैसे आनंदित किया जाए । आप एक बुद्धिमान, सुंदर और आनंदमयी व्यक्ति बन जाते हैं। आप एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जिसके विषय में आपको पता नहीं होता। आप स्वयं को परख लीजिए कि जो में कह रही हूँ वह सही है या नहीं है।
एक सहज योगी कहीं भी रह सकता है, कहीं भी सो सकता है। उसकी आत्मा उसे प्रसन्नता प्रदान करती है। सारे विचार जो मनुष्यों में हैं उन्हें समस्याओं में फंसाते जाते हैं कि आप किसी दूसरे धर्म के अनुयायी हैं तो आप 'खराब' हैं। अगर आपको ईसाईयों के विषय में पूछना है तो जीवों से पूछ लीजिए। जीव के विषय में आपको मुसलमान बतायेंगे और मुसलमानों के विषय में आपको हिन्दू। आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि वो कैसे लोगों के विषय में बोलते हैं। जैसे अन्य सारे 'ख़राब' हैं और वो ही सबसे अच्छे हैं।
अतः यह विचार पूर्ण रूप से बदल जाते हैं। सहज में आप भूल जाते हैं कि कौन क्या हैं, किसका धर्म क्या है, कौन किस परिवार से आया है। सारे एक हो जाते हैं। वे सारे सहजयोगियों कि सामूहिकता का आनंद उठाते हैं- यहीं मक्का है, यहीं कुम्भ मेला है। यह सामूहिक आनंद आपको इसलिए मिलता है कि आप उन सभी बन्धनों को काट जाते हैं जो सत्य को देखने से आपको रोकता है। सत्य यह है कि आप आत्मा बन गए हैं, और जब आप आत्मा बन जाते हैं तब आप गुणातीत , कालातीत और धर्मातीत भी बन जाते हैं।
आप सागर की एक बूंद बन जाते हैं। अगर यह बूंद सागर के बाहर रहती है तब यह सदैव सूर्य से डरी रहती है क्योंकि वह इसे सुखा देगा। परन्तु जब वह सागर के साथ होती है तब वह आनंदित होती है क्योंकि वह अकेली नहीं है -बल्कि आनंद के सागर की लहरों के साथ हिलोरें ले रही होती है।
परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी जी 21 मार्च १९९८ नयी दिल्ली
Posted in आत्म-साक्षात्कार, आत्मा by Rajendra | 0 प्रतिक्रिया
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मानव का अन्तिम लक्ष्य यही है कि वो शिव तत्व को प्राप्त करे। शिव तत्व बुद्धि से परे है। उसको बुद्धि से नहीं जाना जा सकता। जब तक आप आत्म-साक्षात्कारी नहीं होते, जब तक आपने अपने आत्मा को पहचाना नहीं, अपने को जाना नहीं, आप शिव तत्व को जान नहीं सकते। शिवजी के नाम पर बहुत ज्यादा आडम्बर, अन्धता और अंध-श्रद्धा फैली हुई है। किंतु जो मनुष्य आत्म साक्षात्कारी नहीं वो शिवजी को समझ ही नहीं सकता क्योंकि इनकी प्रकृति को समझने के लिए सबसे पहले मनुष्य को उस स्थिति में पहुंचना चाहिए जहाँ पर सारे ही महान तत्व अपने आप विराजें। उनके लिए कहा जाता है कि वे भोले शंकर हैं। आजकल बुद्धिवादी बहुत से निकल आए है संसार में, और अपनी बुद्धि की उड़ान से जो चाहे वो उट पटांग लिखा करते हैं और फ़िर कहते हैं ये शिवजी तो भोले हैं। इनका भोला होना बुद्धिवादियों के हिसाब से तो एकदम ही बेकार चीज़ है। आजकल आदमी जितना चालाक और चुस्त होगा वो यशस्वी हो जाता है। तो इनका भोलापन कैसे समझा जाए? आजकल के लोग सोचते हैं जो आदमी भोला होता है वो बिल्कुल बेवकूफ है। लेकिन शिवजी का भोलापन ऐसा है कि जहां वो सब कुछ है। समझ लीजिये कि जरुरत से ज्यादा कोई श्रीमंत रईस आदमी हो जाए और उसको विरक्ति आ जाए और उसका लोग धन उठा के ले जाए तो लोग कहेंगे अजीब भोला आदमी है जिसका लोग धन चुरा रहे हैं उसपे कोई असर ही नहीं। लेकिन जब उसको विरक्ति आ गई और उस धन का उसके लिए महात्म्य ही नहीं रहा वो अपने भोलेपन में बैठा है और भोलेपन का मज़ा ले रहा है। जब चीज़ अपने आप हो ही रही है, सब कुछ कार्यान्वित ही है तो शिवजी का उसमे कार्य भाग क्या रहता है? वे भोलेपन से सब चीज़ देखते रहते हैं। वो साक्षी स्वरूप हो गए और शक्ति का कार्य देखते हैं। शक्ति ने सारी सृष्ठी रचाई और शक्ति ने ही सारी देवी-देवता बनाये और उनके सारे कार्य बना दिए। उनकी नियुक्ति हो गई और अब शिवजी को क्या काम हैं? शिवजी को बस देखना हैं। और फ़िर देखने में ही सब कुछ आ जाता हैं। उनके भोलेपन का असर ये है कि जिसपे भी दृष्टी पड़ जाए वो ही तर जाता है। जिसके तरफ़ उनका चित्त चला जाए वो ही तर जाए। कुछ उनको करने कि जरुरत ही नही हैं। ये सब खेल है। जैसे बच्चों के लिए खेल होता है परमात्मा के लिए वो सारा एक खेल है। Posted in आत्म-साक्षात्कार, शिव, शिव तत्व, शिव शक्ति by Poonam :) | 2 प्रतिक्रिया
हमारा जीवन आत्म-साक्षात्कार के बाद एक दिव्य, एक भव्य, एक पवित्र जीवन बन जाता है इसीलिए मनुष्य के लिए आत्म-साक्षात्कार पाना अति आवश्यक है। उसके बगेर उसमे संतुलन नही आ सकता। उसमें सच्ची सामूहिकता नहीं आ सकती। उसमें सच्चा प्रेम नहीं आ सकता। और सबसे अधिक उसमें सत्य जाना नहीं जा सकता। तो सारा ज्ञान, उसकी शुद्ध ज्ञानता आ जाती है। जिसे कि विद्या कहा जाता है, तो उसका देखना भी निरंजन हो जाता है। वो देखना मात्र होता है। कोई बीज को देखते वक्त उसमें कोई उसकी प्रतिक्रिया नही होती है। देखता है और देखने से ही पूरा ज्ञान हो जाता है उस चीज़ का। तो मनुष्य हमेशा जब आत्म-साक्षात्कार से प्लावित नही होता तो वो एक तरह से अपने ही बारे में सोचता है। Posted in आत्म-साक्षात्कार, ज्ञान, सामूहिकता by Poonam :) | 1 प्रतिक्रिया
Posted in आत्म-साक्षात्कार, कुण्डलिनी शक्ति, शिव, सहजयोगी by पूनम | 0 प्रतिक्रिया
Posted in आत्म-साक्षात्कार, तनाव का कारण by Madhavi | 2 प्रतिक्रिया
एक ही चीज़ मुझे खुशी दे सकती है और वह है कि जैसा प्यार मैंने आपसे किया है, वही प्यार आप एक दुसरे से करें - श्री माताजी निर्मला देवी