कुण्डलिनी शक्ति और सहजयोग  

सृष्टा से हमारी एकाकारिता कराती है कुण्डलिनी! कुण्डलिनी परमात्मा की ही शक्ति है.. संपूर्ण शक्ति.. जो मनुष्य की रीढ़ की हड्डी के निचे के त्रिकोणी हिस्से (Sacrum bone) में साढे-तिन कुण्डलों में विद्यमान रहती हैं। आत्मसाक्षात्कारी गुरु या महापुरुष के संपर्क में आने पर ये कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है और मनुष्य के शरीर के छः उर्जा केन्द्रों यानि चक्रों के अंदर से निकलकर सर के उपरी भाग में स्थित सातवे चक्र को भेद कर सृष्टा से हमारी एकाकारिता करा देती है। यह एक सहज घटना है, एक जिवंत क्रिया है! मानव के अध्यात्मिक विकास की अन्तिम अवस्था है। महायोग है.. सहजयोग है!


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सहजयोग क्या हैं ?  

सहजयोग व्यक्तिगत चेतना की सर्व व्यापी परमेश्वरी शक्ति से नैसर्गिक एकाकारिता है, जो सभी मनुष्यों में उनकी रीढ़ के अंत में स्थित पावन त्रिकोणाकार अस्थि में सुप्तावस्था में स्थित कुण्डलिनी की अवशिष्ट शक्ति की जागृति से घटित होती है।


सहजयोगी यदि ध्यान धारणा करें और स्वयं को पूर्ण शान्ति में बनाए रखें और पूरी तरह से समर्पित रहें तो उन्हें कुछ नहीं हो सकता.  

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विनाश शुरू हो चुका हैं। भयंकर तूफ़ान, भूचाल और दुर्घटनाएं तथा प्राकृतिक प्रकोप इस कार्य को कर रहे हैं और यह सब कल्कि अवतार के परिणाम स्वरूप हैं। परन्तु यह अवतार एक अन्य कार्य भी कर रहा है, वह है, लोगों को आत्म-साक्षात्कार (पुनर्जन्म) देना। आत्म-साक्षात्कारी लोगों को यह घटनाएँ कभी हानि नही पहुंचाती। इन लोगों को कुछ नही हो सकता। सदैव उनकी रक्षा होगी और उनकी हर चीज़ की रक्षा होगी क्योंकि ये अपनी माँ की सुरक्षा में हैं।


अब समस्या यह है कि इन लोगों से सहजयोगी कैसे व्यवहार करें ताकि ये लोग विकास प्रक्रिया के मार्ग में बाधाएं न उत्पन्न कर सकें? इसका एक मात्र समाधान कुण्डलिनी कि जागृति हैं। अगर किसी बुरे से बुरे व्यक्ति कि भी कुण्डलिनी आप उठा देंगे तो या तो वह नष्ट हो जाएगा या भला व्यक्ति बन जाएगा। कुण्डलिनी जागृति के पश्च्चात सभी दुष्कर्मों की योजना जो उनके मस्तिष्क में है वे त्याग देंगे और वास्तव में बहुत अच्छे लोग बन जायेंगे। हो सकता हैं कि कुछ मामलों में ऐसा ना हो। मैं नहीं कहती कि हर व्यक्ति के साथ सहजयोग सफल हो जायेगा। परन्तु सहजयोगी यदि ध्यान करें, पूर्ण शान्ति कि अवस्था में पूरी तरह से समर्पित होकर बने रहें तो उन्हें कुछ नहीं हो सकता। सदैव उनकी रक्षा की जाती है और आप सब लोगों ने इस सुरक्षा का अनुभव किया हैं। परन्तु सर्वप्रथम आपको स्वयं पर विश्वास करना होगा और सहजयोग के प्रति पूर्णतः समर्पित होना होगा।

हर देश, हम कह सकते हैं, आज इस आसुरी शक्तियों के चंगुल में हैं। हमें कुण्डलिनी जागृति के माध्यम से इन लोगों को श्रेष्ठ बनाना हैं। यह कार्य आप कर सकते हैं। आप इस कार्य को कर सकते हैं और इसके लिए कोई विशेष परिश्रम आपको नहीं करना पड़ता। अपने रोज मर्रा के जीवन में आप यह कार्य कर सकते हैं. लोगों का अंतर्परिवर्तन करने के लिए केवल इसी चीज़ की आवश्यकता हैं और आप सब इसको कर सकते हैं। आप सबको यह कार्य अत्यन्त निष्ठा से, भलीभांति करना चाहिए। क्रोध में आकर लोगों पे उछालने की या अभद्र व्यवहार करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं. शांत रहते हुए इस उपलब्धि को प्राप्त करना चाहिए ताकि श्री शिव का क्रोध न भड़क उठे और जैसे कहते हैं, उनकी तीसरी आँख ना खुल जायें. ऐसा होना बहुत भयानक हैं। हम सब इस कार्य को अत्यन्त रचनात्मक तरीके से कर सकते हैं।


अतः सर्वप्रथम हमें अपने शिवतत्व को स्थापित करना चाहिए - आनंद, प्रेम एवं शान्ति के तत्व को।



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(पुणे, ०५/०३/२०००)




उन्होंने पृथ्वी माँ के अंदर कुण्डलिनी का सृजन किया और पृथ्वी माँ के बाहर श्री गणेश का  



"परन्तु हम उस बिन्दु पर आयेंगे जहाँ आदिशक्ति ने पृथ्वी माँ पर कार्य आरम्भ किया। पहली चीज जो हमें जननी आवश्यक हैं वो ये हैं कि उन्होंने पृथ्वी माँ के अंदर कुण्डलिनी का सृजन किया और पृथ्वी माँ के बाहर श्री गणेश का। ये अत्यन्त दिलचस्प बात हैं। इस प्रकार पृथ्वी माँ हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बन जाती हैं। हम यदि पृथ्वी माँ का सम्मान करना नही जानते तो हमें अपना सम्मान करना भी नही आता। निःसंदेह कुण्डलिनी आपके अंदर आदिशक्ति कि अभीव्यक्ति हैं। आपके अंदर यह आदिशक्ति का प्रतिबिम्ब हैं। परन्तु जैसा आप जानते हैं भिन्न स्थानों, देशों तथा नगरों में भी चक्रो तथा आदिशक्ति के सृजन के रूप में पृथ्वी माँ में इस प्रतिबिम्ब कि अभिव्यक्ति हुई हैं। सर्वप्रथम एक अत्यन्त पावन पृथ्वी माँ का सृजन आवश्यक था जिस पर मनुष्य जन्म ले सके।"


- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(कबेला, २५/०५/१९९७ )

श्री माताजी निर्मला देवी