स्वाधिष्ठान चक्र विडीयो  

मूलाधार चक्र विडीयो  

प्रपंच और सहजयोग  

सर्वप्रथम प्रपंच शब्द का अर्थ देखते है : प्रपंच (प्र + पंच) में 'पंच' पाँच महाभूतों द्वारा निर्माण कार्य को बताता है| परन्तु इससे पहले 'प्र' आने के कारण इसका अर्थ परिवर्तित हो जाता है अर्थात पंच महाभूतों को जो प्रकाशित करता है वह 'प्रपंच' है|  

"अवघाची संसार सुखाचा करीन" (समस्त संसार सुखमय बनाऊंगा) तो यह सुख प्रपंच में प्राप्त होना चाहिए| प्रपंच छोड़कर अन्यत्र परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती| आम लोग 'योग' का अर्थ हिमालय पर जाकर तपस्या करना और ठण्ड से मर जाना लगाते हैं| यह योग नहीं हैं, हठ है - हठ भी नहीं मूर्खता है| महाराष्ट्र में जितने भी संत हुए वे सब गृहस्थ थे| उन्होंने प्रपंच किया| परन्तु 'दास बोध' (श्री रामदास स्वामी विरचित मराठी ग्रन्थ) के हर पृष्ठ में प्रपंच बह रहा है| प्रपंच के बिना आप परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते| यह बात उन्होंने अनेक बार कही है| प्रपंच त्यागकर परमेश्वर को प्राप्त करने की धारणा पिछले बहुत से वर्षों से हमारे देश में आई है क्योंकि गौतम बुद्ध प्रपंच त्यागकर जंगल में गए और उन्हें वहाँ आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ| परन्तु यदि वे गृहस्थ में रहते तो भी उन्हें साक्षात्कार होता| मान लीजिये हमें दादर जाना है, तो हम सीधे मार्ग से वहाँ पहुँच सकते हैं| परन्तु हम भिवण्डी जाएं, वहाँ से पूना जाएं और फिर कई और जगह घूमकर दादर पहुँचे| एक रास्ता सीधा है और दूसरा घुमावदार| घुमावदार मार्ग ही सच्चा है, यह बात ठीक नहीं है| उस समय क्योंकि सुगम को उन्होंने दुर्गम बना डाला तो क्या हमें भी ऐसा ही करना चाहिए? 'सहज समाधी लागो'| कबीर ने विवाह किया, गुरुनानक देव जी ने विवाह किया, राजा जनक से लेकर अब तक जितने भी बड़े बड़े अवधूत हो गए हैं वे सभी गृहस्थ थे| उसके बाद बहुत से ऐसे संत आए जो विवाहित न थे, परन्तु किसी ने भी विवाह संस्था को गलत नहीं कहा और न ही प्रपंच को गलत कहा| तो सर्वप्रथम हमें अपने दिमाग से यह धारणा निकाल देनी होगी कि योग प्राप्ति के लिए प्रपंच का त्याग आवश्यक है| इसके विपरीत यदि आप प्रपंच करते हैं (गृहस्थ जीवन में हैं) तो आपको सहजयोग में अवश्य आना चाहिए|

- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
 २९/११/१९८४

आत्म-साक्षात्कार  

Courtesy - SITA

कृतयुग की विशेषता  


कृतयुग जब प्रकट होता है तो इसकी एक अन्य विशेषता भी है जिसके द्वारा बाह्य धर्मों का असत्य, सत्तारूढ़ लोगों के देश-विरोध एवं बेईमानी की स्वतः ही पोल जाती है. झूठ-मुठ के सभी पैगम्बर एवं पंथ -प्रमुखों की पोल खुल जायेगी तथा परमात्मा के नाम पर घृणा एवं असत्य फैलाने वाली संस्थाओं का कृतयुग में भंडाफोड़ हो जाएगा, क्योंकि इस काल में सत्य स्वतः प्रकट हो जाता है। सभी भ्रष्ट उद्यमी तथा झूठें गुरुओं का पर्दाफाश हो जाएगा।

कृतयुग में कष्ट भुगतने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, परन्तु यह हमारे अपने ही कर्मों का फल है जिसको हमें भुगतना होगा। यदि लोग योगवर्णित आत्मावस्था या परमेश्वरी शक्ति से एकाकारिता प्राप्त कर लें तो निःसंदेह इन कष्टों से
बचा जा सकता है। पूर्ण आध्यात्मिकता का मार्ग ही मानव के लिए एकमात्र सुख-प्रदायक मार्ग है इसे स्वीकार किए बिना कृतयुग में पोल खुलने की यह अभिव्यक्ति तथा दूरक्रम कर्मफल के माध्यम से घटित होता ही रहेगा। सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लोग जो कष्ट भुगतेंगे वे उनके कर्मफल के अतिरिक्त कुछ अन्य न होंगे, वर्तमान में उन्हीं की इच्छाओं का फल।

इस पक्ष के बावजूद भी वास्तविक गंभीर सत्य-साधकों के लिए कृतयुग सुखद काल है। कृतयुग में आत्मपरिवर्तन के अद्वितीय अवसर हैं। उत्थान को प्राप्त करके ये साधक अत्यन्त महान आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे।


- श्री माताजी निर्मला देवी

कृतयुग का आरम्भ  


लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व सत्ययुग की क्रियाशीलता को दर्शाते हुए अन्तः कालीन (बीच का समय) कृतयुग का आरम्भ हुआ। कृत-युग आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय काल हैं क्योंकि इसमें परमात्मा की सर्वव्यापी शक्ति, जिसे हम संस्कृत में 'परमचैतन्य' कहते हैं, सर्वसाधारण मानव के स्तर पर गतिशील हो उठी है। भविष्यवाणी की गई हैं की यह परमेश्वरी गतिविधि चिरप्रतीक्षित विकास एवम् आध्यात्मिक उत्थान के युग - सत्ययुग को लौटा कर लाएगी। सभी प्रकार से देखा जा सकता है की सत्य का समय अब उन्नत हो रहा है और हम स्पष्ट रूप से देख सकते है की सहजयोग के माध्यम से किस प्रकार बिल्कुल सर्वसाधारण लोग भी पूर्ण सत्य एवम् वास्तविकता के प्रति चेतन हो रहे है।



- श्री माताजी निर्मला देवी

कुण्डलिनी शक्ति और सहजयोग  

सृष्टा से हमारी एकाकारिता कराती है कुण्डलिनी! कुण्डलिनी परमात्मा की ही शक्ति है.. संपूर्ण शक्ति.. जो मनुष्य की रीढ़ की हड्डी के निचे के त्रिकोणी हिस्से (Sacrum bone) में साढे-तिन कुण्डलों में विद्यमान रहती हैं। आत्मसाक्षात्कारी गुरु या महापुरुष के संपर्क में आने पर ये कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है और मनुष्य के शरीर के छः उर्जा केन्द्रों यानि चक्रों के अंदर से निकलकर सर के उपरी भाग में स्थित सातवे चक्र को भेद कर सृष्टा से हमारी एकाकारिता करा देती है। यह एक सहज घटना है, एक जिवंत क्रिया है! मानव के अध्यात्मिक विकास की अन्तिम अवस्था है। महायोग है.. सहजयोग है!


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निर्विचार चेतना  

मानव मस्तिष्क सदैव विचारों का निशाना बना रहता है। ये अहम् की रचना करता है और इसके कारण प्रतिक्रिया करता है। बंधनों में फंसे हुए लोग सदैव भयभीत रहते हैं। ये वीचार या तो भूतकाल से आते हैं या भविष्यकाल से, परन्तु वास्तविकता तो वर्तमानकाल में विद्यमान है, जहाँ हम शान्ति प्राप्त करते हैं।

मस्तिष्क किसी व्यक्ति विशेष या सामूहिकता के लिए समस्या खड़ी करता हैं। उसे चाहिए की मस्तिष्क से ऊपर उठकर निर्विचार चेतना में स्थापित हो जाए जहाँ शान्ति हैं।

शान्ति-वीरों की एक प्रजाति का सृजन किया जा चुका है। में तो केवल इतनी आशा करती हूँ की इस प्रजाति का इस प्रकार विस्तार हो की बहुत से लोग शांत होकर अपने व्यक्तित्व एवं दिव्य कार्यों द्वारा विश्व में शान्ति प्रसारित करें।


- श्री माताजी निर्मला देवी

सूक्ष्म तंत्र (उत्क्रांति का मध्य मार्ग)  


१) मूलाधार चक्र


२) स्वाधिष्ठान चक्र


३) नाभि चक्र


३.) भवसागर चक्र


४) अनाहत चक्र


५) विशुद्धि चक्र


६) आज्ञा चक्र


७) सहस्रार चक्र



शरीर में नाडियाँ

१) इडा नाडी २) पिंगला नाडी ३) सुषुम्ना नाडी




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शरीर में के चक्रा  

संतुलित व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए बहुत उपयुक्त होता है  


"अन्तःदर्शन करते हुए यदि मनुष्य हार्दिक विनम्रता से कहे : 'अभी तक मुझे सत्य का ज्ञान नहीं है, परन्तु यह ज्ञान मुझे प्राप्त करना है,' तो समय के साथ-साथ इस विनम्रता का फल प्राप्त होगा और वह व्यक्ति उत्थान प्राप्त कर लेगा। ऐसा यदि हो जाता है, तो व्यक्ति का चित्त मध्य में आ जाता है, न बाएँ को रहता है और न दायें को। अर्थात उसका चित्त न तो उसके पूर्वबन्धनों से नियंत्रित होता है और न ही उसके महत्वाकांक्षी अहम् द्वारा संचालित। ऐसा संतुलित व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए बहुत उपयुक्त होता है और आत्मसाक्षात्कार द्वारा वह सत्य को पूर्ण रूप में जान सकता है।"


- प. पु. श्री माताजी निर्मला देवी
(स्रोत - 'परा आधुनिक युग' )

सहजयोग क्या हैं ?  

सहजयोग व्यक्तिगत चेतना की सर्व व्यापी परमेश्वरी शक्ति से नैसर्गिक एकाकारिता है, जो सभी मनुष्यों में उनकी रीढ़ के अंत में स्थित पावन त्रिकोणाकार अस्थि में सुप्तावस्था में स्थित कुण्डलिनी की अवशिष्ट शक्ति की जागृति से घटित होती है।


आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं  

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अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना, पूजा का सार हैं। पूजा महत्वपूर्ण है परन्तु अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण किस प्रकार प्राप्त किया जाए? अपने लिए जब हमें कोई भौतिक पदार्थ कि इच्छा होती है तो हमें ये जान लेना चाहिए कि ये पदार्थ परमात्मा ने हमें प्रदान किया है। हर चीज़ परमात्मा कि हैं।


हम यदि परमात्मा को पुष्प अर्पण करते हैं तो पुष्प तो परमात्मा का ही सृजन है, हम क्या अर्पण कर रहे हैं? परमात्मा को हम दीप दिखाते हैं, या परमात्मा कि आरती करते हैं तो क्यों? ये प्रकाश भी तो परमात्मा का ही हैं! हम क्या करते हैं? परन्तु परमात्मा को प्रकाश दिखने से हम अपने अंदर कि प्रकाश की पूजा करते हैं। हमारे अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं। प्रकाश तत्व यहाँ-आज्ञा-तक हैं। जब आप आरती करते हैं या परमात्मा के सन्मुख दीपक जलाते हैं, जब आप परमात्मा को प्रकाश दिखाते हैं तो आपके अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं।


अब आप पुष्प अर्पण करते हैं तो मूलाधार ज्योतिर्मय हो जाता है। अब आप मधु अर्पण करते हैं तब आपका चित्त प्रबुद्ध होता है। तो क्यों हम ये सब परमात्मा को अर्पण करते हैं? आखिरकार परमात्मा को तो कुछ भी नही चाहिए। परन्तु परमात्मा भोक्ता (Enjoyer) हैं। आप भोक्ता नहीं हैं। आप भोग नहीं सकते। आपके अंदर परमात्मा भोक्ता हैं। जब परमात्मा वहां पर होते हैं तो वे आनंद उठाते हैं, अर्थात आत्मा। अतः आपकी आत्मा को जो चीज़ अच्छी लगती है उसका उपयोग पूजा-अर्चना करने के लिए करते हैं।


स्थूल से आत्मा की ओर जाना, ये वो चीज़ हैं जिससे आप चलते हैं क्योंकि पहले आप अपने chakron को ज्योतिर्मय करते हैं, चक्र ज्योतिर्मय होने पर आपके देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, और जब देवी-देवता प्रसन्न होते हैं तो कुण्डलिनी को ऊपर उठने का रास्ता प्राप्त होता है। मार्ग बन्ने पर कुण्डलिनी ऊपर उठती है और आपके चित्त का समन्वय आत्मा से होने लगता है। एक-एक कदम आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं, सूक्ष्म पदार्थ से अपने चक्रों की ओर, चक्रों से अपने देवी-देवताओं कि ओर तथा देवी-देवताओं से आत्मा कि ओर।



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(लन्दन, २७/०९/१९८०)



अपने चित्त को मध्य में रखें  

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कपड़े के टुकड़े का एक अन्य उदाहरण लें। ये चित्त का द्योतक है। आत्म-साक्षात्कार से पूर्व यह सभी दिशाओं में पूर्णतः फैला हुआ होता है। कपड़े के टुकड़े को मध्य में अपनी एक उंगली से ऊपर की ओर उठाएं। क्या होता है। एक सीमा तक कपड़ा ऊपर को उठाता हैं और इस प्रक्रिया में या तो यह उंगली पर लिपट जाता है या उंगली के चहुँ ओर लटक जाता है। इसी प्रकार से जब कुण्डलिनी उठती है तो यह चित्त को ऊपर उठाती है, चित्त को सहस्रार तक ले जाती है जहाँ ब्रम्हचैतन्य के प्रकाश से चित्त ज्योतिर्मय हो उठता है। तत्पश्चात मध्य में यह सुषुम्ना नाडी पर या तो कुण्डलिनी के चहुँ ओर लिपट जाता है या लटक जाता है। आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् हुआ यह कि बाह्य जगत में यहाँ कहीं भी हमारा चित्त फैला हुआ था वह अंदर कि ओर खिंच कर ज्योतिर्मय हो गया। यही वह अवस्था है। परन्तु वास्तव में हम मानव अपनी आदतों के गुलाम हैं। आदत कि वजह से हम अपने चित्त को स्थायी रूप से उस अवस्था में नहीं रहने देते। वास्तव में चित्त बाहर नहीं जाना चाहिए। यही एक साधारण अवस्था है जिसमें मैं स्वयं आपके अंदर रहना चाहती हूँ। आगे बढ़ने के लिए मैं आपको नाव में बिठा रही हूँ, परन्तु आप लोग अपना एक पैर पानी में डालकर लगातार मेरी सहायता का प्रतिरोध कर रहे हैं। आपका चित्त तुच्छ चीज़ों पर है, आप भली भाँती जानते है कि आपको पार करने के लिए मैं अंदर बैठी हुई हूँ परन्तु फ़िर भी आदतन आप अपनी टांग अडातें हैं। अब क्या आप मेरे कष्ट की कल्पना कर सकते हैं? कल्पना करें कि मुझे कैसे लगता होगा!


इसीलिए मै कहती हूँ कि सत्संग करें - अर्थात चित्त को मध्य में रखने के लक्ष्य से अन्य सहजयोगियों के साथ समय बिताएं। निरंतर अपने चित्त को मध्य में बनाये रखना अत्यन्त आवश्यक हैं। आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् दिव्या ऊर्जा प्राप्त करके हमारे बाएँ और दाएं की नादियों का तनाव समाप्त हो जाता हैं। तनाव-मुक्त होने पर चक्र और अधिक खुलते हैं। यह घटना चक्र (cycle) है। तब कुण्डलिनी के और अधिक तंतु ऊपर कि ओर उठते हैं। इस अवस्था में मध्य में बने रहने का गुण विकसित हो जाता है।



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(२६,२७ फरवरी १९८७)

सहजयोग कर्मकांडो के विरुद्ध है  

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जैसे ही आप मन से अहंकार निकालने का प्रयत्न करेंगे, वैसे ही मन बढ़ता जायेगा और अहंकार बढ़ता जाएगा. "अहम् करोति साहंकारः"। हम करेंगे, इसका मतलब ये है कि अगर हम अपने अहंकार को कम करने की कोशिश करें, तो अहंकार बढ़ जाएगा क्योंकि हम अहंकार से ही कोशिश करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि हम अपने अहंकार को दबा लेंगे, खाना कम खायेंगे, दुनिया भर के उपद्रव एक पैर पर खड़े हैं, तो कोई सर के बल खड़ा है। अपने अहंकार को नस्त करने के लिए हर तरह के लोग प्रयोग करते हैं। लेकिन इससे अहंकार नष्ट नही होता, बढ़ता हैं। उपवास करना, जप-तप करना आदि सब चीजों से अहंकार बढ़ता है। हवं से भी अहंकार बढ़ता है क्योंकि अग्नि जो है वो दाई (Right side) तरफ़ है। जो कुछ भी कर्म-काण्ड हम करते हैं, Rituals करते हैं, उससे अहंकार बढ़ता है, और मनुष्य सोचता है कि हम सब ठीक हैं।


हजारों वर्ष से वही-वही कर्मकांड करते जाते हैं और उल्टा-सीधा सब मामला, जो भी सिखाया गया, वही मनुष्य कर रहा है। इसीलिए सहजयोग कर्मकांड के विरोध में हैं। कोई भी कर्मकांड करने की जरुरत नहीं और अतिशयता पर पहुंचना तो और ग़लत बात है।


- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(गणपति पुले, भारत, २५/१२/१९९७)


शरीर परमात्मा का मन्दिर है और आपने अपने स्वास्थ्य की देखभाल करनी हैं  

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हर देश में कुछ विशेषता है जिसके कारण व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं आती हैं। अतः सहजयोगी होने के नाते व्यक्ति को समझना चाहिए कि स्वास्थ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। यह शरीर परमात्मा का मन्दिर है। अतः आपको अपने स्वास्थ्य कि देखभाल करनी होगी। आप यह भी जानते हैं कि जब कुण्डलिनी उठती है तो पहली घटित होने वाली घटना आपके स्वास्थ्य का ठीक हो जाना हैं। क्योंकि आपका परानुकम्पी (Parasympathetic) तंत्र कार्यान्वित हो जाता हैं। परानुकम्पी, व्यक्ति को ज्योति प्रदान करता है जिसका प्रवाह अनुकम्पी (Sympathetic) तंत्र में होता है तथा व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा हो जाता हैं।


- परम पूज्य श्री माताजी
(कैक्सटन हॉल, लन्दन, १०/१२/१९७९)

मंत्र ऐसे होने चाहिए की जो मशीनवत (mechanical) न हों  




"आपको चाहिए कि मंत्रो को देखें। मंत्र मशीनवत नहीं होने चाहिए कि आप मशीन की तरह से बोले चले जा रहे हैं। मंत्र ह्रदय से कहे जाने चाहिए। मंत्र यदि ह्रदय से नहीं कहे गए तो ये सिद्ध नहीं होते अर्थात सौ बार उच्चारण करने पर भी इनका कोई प्रभाव न होगा. सिद्ध मंत्र वह होता हैं उच्चारण करने पर जिसका प्रभाव हो, जो कार्य करें। मंत्र यदि कार्य नही करता तो आपका मंत्र अर्थहीन हैं।

देवी-देवताओं को जागृत करने के लिए आवश्यक हैं कि आपका मंत्रोच्चारण शुद्ध हो और आपका ह्रदय इसमे लिप्त हो।"


- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी

मंत्र क्या हैं?  



"यह आत्मा की अभीव्यक्ति करने वाले शब्द की शक्ति है। मंत्र मात्र एक विचार होता है जो चैतन्यित है। चैतन्य से परिपूर्ण कोई भी विचार मन्त्र हैं।"



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(विएन्ना, ०४/०९/१९८३)

साकार को निराकार में परिवर्तित करने के उपायों में पूजा एक है  





"....क्योंकि किसी विग्रह, पृथ्वी माँ की चैतन्य लहरियों से बने स्वयंभु की पूजा करने से लोगों को बड़ी-बड़ी समस्याएं झेलनी पड़ी। सर्वप्रथम उन्हें ध्यान धारणा करनी पड़ी जो सविकल्प समाधि कहलाती थी। इसका अर्थ हैं की उस अवस्था में आपको ऐसी स्वयंभु मूर्ति 'विग्रह' पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता था। विग्रह का अर्थ है वह मूर्ति जिससे चैतन्य बहता हो।


ऐसा करते हुए साधक को कुण्डलिनी उठाने का प्रयत्न करना पड़ता था। और कुण्डलिनी आज्ञा चक्र तक आ जाया करती थी, परन्तु इससे आगे सहस्रार तक पहुँच पाना असंभव कार्य था क्योंकि इसके लिए व्यक्ति को साकार से निराकार में जाना पड़ता है। और निराकार पर ध्यान केंद्रित करना भी एक अन्य असंभव कार्य था - जैसे मुसलामानों तथा बहुत से अन्य लोगों ने करने का प्रयत्न किया। ऐसी परिस्थितियों में ये आवश्यक था कि निराकार साकार रूप धारण करे ताकि जटिलताएं समाप्त हो जाएँ। ज्यों ही आप साकार पर ध्यान केंद्रित करें आप ही निराकार हो जायें। मान लो आपके सन्मुख बर्फ है, इसे छुते ही यह पिघलने लगती है और आप इसकी शीतलता महसूस करने लगते हैं।


तो अब समस्या आसानी से हल हो गई। पूजा उन विधियों में से एक है जिनसे आप साकार को निराकार बना सकते हैं। आपके चक्र ऊर्जा के चक्र हैं, परन्तु उन सभी चक्रों पर भी पथ प्रदर्शक देवता विराजमान हैं. उन्हें भी साकार से निराकार बनाया गया है। जब आप पूजा करते हैं तो आकार पिघलकर निराकार ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है तथा ये निराकार उर्जाएं प्रवाहित होने लगती हैं और वायु बहने लगती हैं। और इस प्रकार आत्मा से असत्य तादात्म्य (Misidentification) और आत्मा पर ये व्यर्थ का बोझ लादने (Super impositions) के भ्रम दूर हो जाते हैं।"



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(पेरिस, १८ जून १९८३)

विश्व निर्मला धर्म क्या है  



"अपने श्याम के ध्यान मैं आपको पूछना चाहिए, " मैंने सहजयोग के लिए क्या कीया?" केवल एक यही प्रश्न। मेरे जेसे या श्री कृष्ण जैसा व्यक्ती ये भी नही सोचता के हम कुछ कर रहे है। तो हम क्या पूछ सकते है? मैं यदि अपने बारे मैं विश्लेषण करू या सोचु तो मैं खो जाती हु। ये मेरी शक्ति से परे है। परन्तु बेहतर होगा के आप अपने आप को समझे। जहा तक मेरा सम्बन्ध है, मैं सोचती हूँ के जब तक मेरा जीवन है, मैं नही जानती - हो सकता है मैं हमेशा जीवित रहूँ, मैं हमेशा भी जीवीत रह सकती हु, परन्तु जब तक मैं पृथ्वी पर हु, मैं ये देखूंगी के सहजयोग पुर्णतः स्थापित हो गया है। आप लोगो से मेरा ये वचन है। 'संस्थापनार्थयः', धरम को पुनः स्थापित करने के लिए परमात्मा बार - बार अवतरित होते हैं, केवल धर्म ही नहीं, विश्व निर्मला धर्म, जो मानव रचित सामान्य धर्मो से कही अधिक उचा धर्म है। विश्व निर्मला धर्म बहुत कम समय मैं स्थापित हो जाएगा।


(परम पूज्य श्री माताजी, इपेविच, U.K. १९.०८.१९९०)


श्री माताजी निर्मला देवी