प्रपंच और सहजयोग
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आत्म-साक्षात्कार
Courtesy - SITA
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कृतयुग की विशेषता
कृतयुग में कष्ट भुगतने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, परन्तु यह हमारे अपने ही कर्मों का फल है जिसको हमें भुगतना होगा। यदि लोग योगवर्णित आत्मावस्था या परमेश्वरी शक्ति से एकाकारिता प्राप्त कर लें तो निःसंदेह इन कष्टों से बचा जा सकता है। पूर्ण आध्यात्मिकता का मार्ग ही मानव के लिए एकमात्र सुख-प्रदायक मार्ग है इसे स्वीकार किए बिना कृतयुग में पोल खुलने की यह अभिव्यक्ति तथा दूरक्रम कर्मफल के माध्यम से घटित होता ही रहेगा। सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लोग जो कष्ट भुगतेंगे वे उनके कर्मफल के अतिरिक्त कुछ अन्य न होंगे, वर्तमान में उन्हीं की इच्छाओं का फल।
इस पक्ष के बावजूद भी वास्तविक गंभीर सत्य-साधकों के लिए कृतयुग सुखद काल है। कृतयुग में आत्मपरिवर्तन के अद्वितीय अवसर हैं। उत्थान को प्राप्त करके ये साधक अत्यन्त महान आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे।
- श्री माताजी निर्मला देवी
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कृतयुग का आरम्भ
- श्री माताजी निर्मला देवी
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कुण्डलिनी शक्ति और सहजयोग
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निर्विचार चेतना
मस्तिष्क किसी व्यक्ति विशेष या सामूहिकता के लिए समस्या खड़ी करता हैं। उसे चाहिए की मस्तिष्क से ऊपर उठकर निर्विचार चेतना में स्थापित हो जाए जहाँ शान्ति हैं।
शान्ति-वीरों की एक प्रजाति का सृजन किया जा चुका है। में तो केवल इतनी आशा करती हूँ की इस प्रजाति का इस प्रकार विस्तार हो की बहुत से लोग शांत होकर अपने व्यक्तित्व एवं दिव्य कार्यों द्वारा विश्व में शान्ति प्रसारित करें।
- श्री माताजी निर्मला देवी
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सूक्ष्म तंत्र (उत्क्रांति का मध्य मार्ग)
१) मूलाधार चक्र
२) स्वाधिष्ठान चक्र
३) नाभि चक्र
३.अ) भवसागर चक्र
४) अनाहत चक्र
५) विशुद्धि चक्र
६) आज्ञा चक्र
७) सहस्रार चक्र
शरीर में नाडियाँ
१) इडा नाडी २) पिंगला नाडी ३) सुषुम्ना नाडी
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संतुलित व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए बहुत उपयुक्त होता है
(स्रोत - 'परा आधुनिक युग' )
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सहजयोग क्या हैं ?
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आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं
अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना, पूजा का सार हैं। पूजा महत्वपूर्ण है परन्तु अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण किस प्रकार प्राप्त किया जाए? अपने लिए जब हमें कोई भौतिक पदार्थ कि इच्छा होती है तो हमें ये जान लेना चाहिए कि ये पदार्थ परमात्मा ने हमें प्रदान किया है। हर चीज़ परमात्मा कि हैं।
हम यदि परमात्मा को पुष्प अर्पण करते हैं तो पुष्प तो परमात्मा का ही सृजन है, हम क्या अर्पण कर रहे हैं? परमात्मा को हम दीप दिखाते हैं, या परमात्मा कि आरती करते हैं तो क्यों? ये प्रकाश भी तो परमात्मा का ही हैं! हम क्या करते हैं? परन्तु परमात्मा को प्रकाश दिखने से हम अपने अंदर कि प्रकाश की पूजा करते हैं। हमारे अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं। प्रकाश तत्व यहाँ-आज्ञा-तक हैं। जब आप आरती करते हैं या परमात्मा के सन्मुख दीपक जलाते हैं, जब आप परमात्मा को प्रकाश दिखाते हैं तो आपके अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं।
अब आप पुष्प अर्पण करते हैं तो मूलाधार ज्योतिर्मय हो जाता है। अब आप मधु अर्पण करते हैं तब आपका चित्त प्रबुद्ध होता है। तो क्यों हम ये सब परमात्मा को अर्पण करते हैं? आखिरकार परमात्मा को तो कुछ भी नही चाहिए। परन्तु परमात्मा भोक्ता (Enjoyer) हैं। आप भोक्ता नहीं हैं। आप भोग नहीं सकते। आपके अंदर परमात्मा भोक्ता हैं। जब परमात्मा वहां पर होते हैं तो वे आनंद उठाते हैं, अर्थात आत्मा। अतः आपकी आत्मा को जो चीज़ अच्छी लगती है उसका उपयोग पूजा-अर्चना करने के लिए करते हैं।
स्थूल से आत्मा की ओर जाना, ये वो चीज़ हैं जिससे आप चलते हैं क्योंकि पहले आप अपने chakron को ज्योतिर्मय करते हैं, चक्र ज्योतिर्मय होने पर आपके देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, और जब देवी-देवता प्रसन्न होते हैं तो कुण्डलिनी को ऊपर उठने का रास्ता प्राप्त होता है। मार्ग बन्ने पर कुण्डलिनी ऊपर उठती है और आपके चित्त का समन्वय आत्मा से होने लगता है। एक-एक कदम आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं, सूक्ष्म पदार्थ से अपने चक्रों की ओर, चक्रों से अपने देवी-देवताओं कि ओर तथा देवी-देवताओं से आत्मा कि ओर।
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(लन्दन, २७/०९/१९८०)
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अपने चित्त को मध्य में रखें
इसीलिए मै कहती हूँ कि सत्संग करें - अर्थात चित्त को मध्य में रखने के लक्ष्य से अन्य सहजयोगियों के साथ समय बिताएं। निरंतर अपने चित्त को मध्य में बनाये रखना अत्यन्त आवश्यक हैं। आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् दिव्या ऊर्जा प्राप्त करके हमारे बाएँ और दाएं की नादियों का तनाव समाप्त हो जाता हैं। तनाव-मुक्त होने पर चक्र और अधिक खुलते हैं। यह घटना चक्र (cycle) है। तब कुण्डलिनी के और अधिक तंतु ऊपर कि ओर उठते हैं। इस अवस्था में मध्य में बने रहने का गुण विकसित हो जाता है।
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(२६,२७ फरवरी १९८७)
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सहजयोग कर्मकांडो के विरुद्ध है
जैसे ही आप मन से अहंकार निकालने का प्रयत्न करेंगे, वैसे ही मन बढ़ता जायेगा और अहंकार बढ़ता जाएगा. "अहम् करोति साहंकारः"। हम करेंगे, इसका मतलब ये है कि अगर हम अपने अहंकार को कम करने की कोशिश करें, तो अहंकार बढ़ जाएगा क्योंकि हम अहंकार से ही कोशिश करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि हम अपने अहंकार को दबा लेंगे, खाना कम खायेंगे, दुनिया भर के उपद्रव एक पैर पर खड़े हैं, तो कोई सर के बल खड़ा है। अपने अहंकार को नस्त करने के लिए हर तरह के लोग प्रयोग करते हैं। लेकिन इससे अहंकार नष्ट नही होता, बढ़ता हैं। उपवास करना, जप-तप करना आदि सब चीजों से अहंकार बढ़ता है। हवं से भी अहंकार बढ़ता है क्योंकि अग्नि जो है वो दाई (Right side) तरफ़ है। जो कुछ भी कर्म-काण्ड हम करते हैं, Rituals करते हैं, उससे अहंकार बढ़ता है, और मनुष्य सोचता है कि हम सब ठीक हैं।
हजारों वर्ष से वही-वही कर्मकांड करते जाते हैं और उल्टा-सीधा सब मामला, जो भी सिखाया गया, वही मनुष्य कर रहा है। इसीलिए सहजयोग कर्मकांड के विरोध में हैं। कोई भी कर्मकांड करने की जरुरत नहीं और अतिशयता पर पहुंचना तो और ग़लत बात है।
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(गणपति पुले, भारत, २५/१२/१९९७)
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शरीर परमात्मा का मन्दिर है और आपने अपने स्वास्थ्य की देखभाल करनी हैं
- परम पूज्य श्री माताजी
(कैक्सटन हॉल, लन्दन, १०/१२/१९७९)
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मंत्र ऐसे होने चाहिए की जो मशीनवत (mechanical) न हों
देवी-देवताओं को जागृत करने के लिए आवश्यक हैं कि आपका मंत्रोच्चारण शुद्ध हो और आपका ह्रदय इसमे लिप्त हो।"
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
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मंत्र क्या हैं?
"यह आत्मा की अभीव्यक्ति करने वाले शब्द की शक्ति है। मंत्र मात्र एक विचार होता है जो चैतन्यित है। चैतन्य से परिपूर्ण कोई भी विचार मन्त्र हैं।"
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(विएन्ना, ०४/०९/१९८३)
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साकार को निराकार में परिवर्तित करने के उपायों में पूजा एक है
ऐसा करते हुए साधक को कुण्डलिनी उठाने का प्रयत्न करना पड़ता था। और कुण्डलिनी आज्ञा चक्र तक आ जाया करती थी, परन्तु इससे आगे सहस्रार तक पहुँच पाना असंभव कार्य था क्योंकि इसके लिए व्यक्ति को साकार से निराकार में जाना पड़ता है। और निराकार पर ध्यान केंद्रित करना भी एक अन्य असंभव कार्य था - जैसे मुसलामानों तथा बहुत से अन्य लोगों ने करने का प्रयत्न किया। ऐसी परिस्थितियों में ये आवश्यक था कि निराकार साकार रूप धारण करे ताकि जटिलताएं समाप्त हो जाएँ। ज्यों ही आप साकार पर ध्यान केंद्रित करें आप ही निराकार हो जायें। मान लो आपके सन्मुख बर्फ है, इसे छुते ही यह पिघलने लगती है और आप इसकी शीतलता महसूस करने लगते हैं।
तो अब समस्या आसानी से हल हो गई। पूजा उन विधियों में से एक है जिनसे आप साकार को निराकार बना सकते हैं। आपके चक्र ऊर्जा के चक्र हैं, परन्तु उन सभी चक्रों पर भी पथ प्रदर्शक देवता विराजमान हैं. उन्हें भी साकार से निराकार बनाया गया है। जब आप पूजा करते हैं तो आकार पिघलकर निराकार ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है तथा ये निराकार उर्जाएं प्रवाहित होने लगती हैं और वायु बहने लगती हैं। और इस प्रकार आत्मा से असत्य तादात्म्य (Misidentification) और आत्मा पर ये व्यर्थ का बोझ लादने (Super impositions) के भ्रम दूर हो जाते हैं।"
- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(पेरिस, १८ जून १९८३)
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विश्व निर्मला धर्म क्या है

"अपने श्याम के ध्यान मैं आपको पूछना चाहिए, " मैंने सहजयोग के लिए क्या कीया?" केवल एक यही प्रश्न। मेरे जेसे या श्री कृष्ण जैसा व्यक्ती ये भी नही सोचता के हम कुछ कर रहे है। तो हम क्या पूछ सकते है? मैं यदि अपने बारे मैं विश्लेषण करू या सोचु तो मैं खो जाती हु। ये मेरी शक्ति से परे है। परन्तु बेहतर होगा के आप अपने आप को समझे। जहा तक मेरा सम्बन्ध है, मैं सोचती हूँ के जब तक मेरा जीवन है, मैं नही जानती - हो सकता है मैं हमेशा जीवित रहूँ, मैं हमेशा भी जीवीत रह सकती हु, परन्तु जब तक मैं पृथ्वी पर हु, मैं ये देखूंगी के सहजयोग पुर्णतः स्थापित हो गया है। आप लोगो से मेरा ये वचन है। 'संस्थापनार्थयः', धरम को पुनः स्थापित करने के लिए परमात्मा बार - बार अवतरित होते हैं, केवल धर्म ही नहीं, विश्व निर्मला धर्म, जो मानव रचित सामान्य धर्मो से कही अधिक उचा धर्म है। विश्व निर्मला धर्म बहुत कम समय मैं स्थापित हो जाएगा।
Posted in विश्व निर्मला धर्म, सहजयोग by Madhavi | 0 प्रतिक्रिया











