कृतयुग की विशेषता  


कृतयुग जब प्रकट होता है तो इसकी एक अन्य विशेषता भी है जिसके द्वारा बाह्य धर्मों का असत्य, सत्तारूढ़ लोगों के देश-विरोध एवं बेईमानी की स्वतः ही पोल जाती है. झूठ-मुठ के सभी पैगम्बर एवं पंथ -प्रमुखों की पोल खुल जायेगी तथा परमात्मा के नाम पर घृणा एवं असत्य फैलाने वाली संस्थाओं का कृतयुग में भंडाफोड़ हो जाएगा, क्योंकि इस काल में सत्य स्वतः प्रकट हो जाता है। सभी भ्रष्ट उद्यमी तथा झूठें गुरुओं का पर्दाफाश हो जाएगा।

कृतयुग में कष्ट भुगतने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, परन्तु यह हमारे अपने ही कर्मों का फल है जिसको हमें भुगतना होगा। यदि लोग योगवर्णित आत्मावस्था या परमेश्वरी शक्ति से एकाकारिता प्राप्त कर लें तो निःसंदेह इन कष्टों से
बचा जा सकता है। पूर्ण आध्यात्मिकता का मार्ग ही मानव के लिए एकमात्र सुख-प्रदायक मार्ग है इसे स्वीकार किए बिना कृतयुग में पोल खुलने की यह अभिव्यक्ति तथा दूरक्रम कर्मफल के माध्यम से घटित होता ही रहेगा। सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लोग जो कष्ट भुगतेंगे वे उनके कर्मफल के अतिरिक्त कुछ अन्य न होंगे, वर्तमान में उन्हीं की इच्छाओं का फल।

इस पक्ष के बावजूद भी वास्तविक गंभीर सत्य-साधकों के लिए कृतयुग सुखद काल है। कृतयुग में आत्मपरिवर्तन के अद्वितीय अवसर हैं। उत्थान को प्राप्त करके ये साधक अत्यन्त महान आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे।


- श्री माताजी निर्मला देवी

प्रेम के सिवाय शिव कुछ भी नहीं  

प्रेम के सिवाय शिव कुछ भी नहीं प्रेम सुधारता है, पोषण करता है और आपके हित की कामना कार्य है। शिव आपके हितों का ध्यान रखते हैं। प्रेम से जब आप दूसरों को हितों का ध्यान रख रहे होते हैं तो जीवन का सारा ढांचा ही बदल जाता है। इतने लोगों से एकाकारिता हो जाने के कारण आप वास्तव में इसका आनंद उठाते हैं। आप एक सर्व्व्यापाक व्यक्ति बन जाते हैं और यही दृष्टीकोण प्राप्त करना है।

जब मुझे पता लगता है की निम्न जाती या रंग के कारण किसीसे दुर्व्यवहार किया गया मेरी समझ में नही आता कि यह कैसे सम्भव है क्योंकि हम सब एक ही शरीर के अंग-प्रत्यंग हैं। एक ही माँ से जन्में सब भाई - बहन हैं। परन्तु यह अनुभूति तभी सम्भव है जब आप अपने सम्बन्धों को इस महान, अथाह प्रेम - सागर में विसर्जित कर देते हैं। स्वयं देखिये कि क्या आप वास्तव में सबसे प्रेम करते हैं? मैं अपने लिए कभी कुछ नही खरीदती। दूसरों का आनंद ही सभी कुछ है। यही सर्वाधिक - आनंददायी है। अपने बारे में सोचें। "मैं यहाँ क्यों हूँ? सभी का आनंद लेने के लिए। ये सब साक्षात्कारी मनुष्य हैं। ये इतने सुन्दर कमल हैं। मैं भी कीचड़ में नहीं धसूंगा। मैं कमल हूँ।" ह्रदय कमल को खोलने का यही तरिका है। ऐसे व्यक्ति कि सुगन्ध भी अति सुन्दर होती है। हम सब में एकाकारिता हो जाने के बाद कहीं भी यदि कोई कार्य होता है तो हम उसका आनंद उठाते हैं। शिव रूपी प्रेम - सागर में अपनी छोटी - छोटी लिप्साओं को विसर्जित करना आवश्यक है।




- परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(इटली, १७/०२/१९९१)


श्री माताजी निर्मला देवी