निर्विचार चेतना  

मानव मस्तिष्क सदैव विचारों का निशाना बना रहता है। ये अहम् की रचना करता है और इसके कारण प्रतिक्रिया करता है। बंधनों में फंसे हुए लोग सदैव भयभीत रहते हैं। ये वीचार या तो भूतकाल से आते हैं या भविष्यकाल से, परन्तु वास्तविकता तो वर्तमानकाल में विद्यमान है, जहाँ हम शान्ति प्राप्त करते हैं।

मस्तिष्क किसी व्यक्ति विशेष या सामूहिकता के लिए समस्या खड़ी करता हैं। उसे चाहिए की मस्तिष्क से ऊपर उठकर निर्विचार चेतना में स्थापित हो जाए जहाँ शान्ति हैं।

शान्ति-वीरों की एक प्रजाति का सृजन किया जा चुका है। में तो केवल इतनी आशा करती हूँ की इस प्रजाति का इस प्रकार विस्तार हो की बहुत से लोग शांत होकर अपने व्यक्तित्व एवं दिव्य कार्यों द्वारा विश्व में शान्ति प्रसारित करें।


- श्री माताजी निर्मला देवी

आत्मा असीम है जब की मस्तिष्क सिमित है  

आत्मा समुद्र की भांति है जिसके अन्दर रोशनी भरी पड़ी है। और जब इस समुद्र (रुपी आत्मा) को आप के मस्तिष्क के छोटे प्याले में उडेल दिया जाता है तब प्याला अपना अस्तित्व खो देता है और सब कुछ अध्यात्मिक हो जाता है। सभी कुछ। आप सब कुछ अध्यात्मिक बना सकते हैं। हरेक चीज़। आप जिस चीज़ को भी स्पर्श करे वह अध्यात्मिक हो जाती है। रेत अध्यात्मिक हो जाती है, जमीन अध्यात्मिक हो जाती है, वातावरण अध्यात्मिक बन जाता है, ग्रह - नक्षत्र इत्यादी भी अध्यात्मिक बन जाते है। सब कुछ अध्यात्मिक हो जाते हैं।


यह आत्मा समुद्र (की भांति असीम) है। जब कि आपका मस्तिष्क सिमित है।

आपके सिमित मस्तिष्क में निर्लिप्तता (detachment) लानी होगी। मस्तिष्क की सभी सीमाओं को तोड़ना होगा। ताकि जब यह समुद्र इस मस्तिष्क को प्लावित कर देता है तब यह उस छोटे प्याले का कण - कण रंग में रंगा जाए। सम्पूर्ण वातावरण, प्रत्येक वास्तु, जिस पर भी आप की दृष्टी जाए, रंग जानी चाहिए। आत्मा का रंग, आत्मा का प्रकाश है और ये आत्मा का प्रकाश कार्यान्वित होता है। कार्य करता है, सोचता है, सहयोग प्रदान करता है, सब कुछ करता है।



- परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(पंढरपुर, २६ फरवरी १९८५)


श्री माताजी निर्मला देवी