नैतिकता अबोधिता की अभिव्यक्ति है  


आदिशक्ति ने सबसे पहले श्री गणेश का सृजन किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्योंकि चैतन्य, पावित्र्य और मंगलमयता से वे सारे वातावरण को भरना चाहती थी। यह गुण अब भी है, सर्वत्र है, चैतन्य अब भी कार्यरत है परन्तु यह आधुनिक मस्तिष्क में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि आधुनिक मस्तिष्क अबोधिता से अनभिज्ञ है। अबोधिता का इसे बिल्कुल ज्ञान नहीं। अबोधिता से ही जीवन में नैतिकता आती है। नैतिकता अबोधिता की अभिव्यक्ति है। अबोधिता से पता चलता है कि व्यक्ति दुश्चरित्र नहीं हो सकता।


- श्री माताजी निर्मला देवी
(१५ सितम्बर १९९६, श्री गणेश पूजा, कबैला, इटली)

अबोधिता का आनंद उठाना चाहिए  

निष्कपटता शिव का एक गुण है। बाल सम वे अबोध हैं। वे साकार अबोधिता हैं। हमें अपनी विषयों, सक्रियों को अबोधिता कि सागर में डुबो देना है। अबोधिता को समझ कर, महत्त्व देकर इसका आनंद उठाना चाहिए। पशु तथा बच्चे अबोध होते हैं। इन सब बातों पर चित्त दें। सड़क पर चलते हुए आपको क्या देखना चाहिए? आप अपनी दृष्टी पृथ्वी से केवल तीन फ़ुट ऊँची रखें। इस ऊंचाई पर आपको फूल, हरी घास और बच्चे दिखाई पड़ेंगे। तीन फ़ुट से ऊँचे लोगों को देखने की आवश्यकता ही नहीं। जो व्यक्ति अबोध नहीं उसकी टांगो तक आप चाहे देख लें लेकिन उसकी आंखों में न देखें। इस इच्छा को अबोधिता में लीन कर दें। मूलाधार अबोधिता हैं तथा पवित्र धर्म परायणता। यह श्री गणेश का गुण हैं। मनुष्य के भांति इस विश्व में रहते हुए, चाहे आप बालक न भी हो तो भी अभी तक आप अबोध हैं।

जैसे एक बार श्री कृष्ण की सोलह-हज़ार और पाँच पत्नियों ने एक प्रसिद्द महात्मा को मिलना चाहा। रास्ते में नदी में बाढ़ के कारण वे उसे पार नहीं कर पाई। वापिस आकर उन्होंने श्री कृष्ण से नदी पार करने की विधि पूछी। तो श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि नदी से जाकर कहो कि "यदि श्री कृष्ण योगेश्वर हैं और ब्रम्हचारी भी, तो पानी नीचे आ जाए।" नदी से इस प्रकार कहने पर नदी का पानी घट गया। अतः संसार में पति - पत्नी आदि की तरह रहते हुए भी आप अबोध हो सकते हैं। यही पवित्रता कि निशानी है।



- परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(इटली, १७/०२/१९९१)

श्री आदिशक्ति ने किस प्रकार ब्रम्हांड का सृजन किया!  



"जिस वातावरण को हम जानते हैं वह सारा का सारा बनावटी है। परन्तु जब आप उनके कार्य को समझ जाते हैं - पहला कार्य जो उन्होंने किया या हम कह सकते हैं, उनकी पहली अभिव्यक्ति हमारे बाएं पक्ष पर हैं। यह महाकाली कि अभिव्यक्ति हैं। तो वे महाकाली रूप में बाएँ और को आती हैं जहाँ उन्होंने श्री गणेशा का सृजन किया। श्री गणेशा का सृजन उनकी पावनता, अबोधिता और मंगलमयता के कारण किया गया। ब्रम्हांड का सृजन करने से पूर्व आदिशक्ति को श्री गणेशा का सृजन करना पड़ा। श्री गणेशा का सृजन करके वो स्थापित हो जाती हैं। तत्पश्चात वे ऊपर कि और गईं, निःसंदेह विराट के शरीर में और वहां गोलाकार घूमकर दूसरी और दाएं पक्ष में गईं जहाँ उन्होंने सभी भुवनों - 'ब्रम्हांड' का सृजन किया। भुवन चौदह हैं अर्थात एक भुवन कैन ब्रम्हान्डो के बराबर होता हैं। इन सब चीजों का सृजन वे दाई ओर पर करती हैं। तब ऊपर जाकर वे पुनः निचे कि ओर आती हैं और इन सभी चक्रो - आदि चक्रो या पीठों का सृजन करती हैं। निचे आकर वे इन सभी पीठो को बनती हैं और फ़िर कुण्डलिनी रूप में इनमें स्थापित हो जाती हैं यद्यपि कुण्डलिनी उनका एक हिस्सा मात्र है। बाकि का कार्य इससे कहीं अधिक हैं। तो यह सारी अवशिष्ट उर्जा - कहने का अभिप्राय ये है कि यह सारी यात्रा करने के पश्चात् वह वापिस आती हैं और कुण्डलिनी रूप में उतर जाती हैं।

इस कुण्डलिनी और चक्रो के कारण वह शरीर के अंदर एक ऐसा क्षेत्र बनती हैं जिसे हम चक्र कहते हैं। ये चक्र वे सर्वप्रथम सर में बनाती हैं, इन्हे हम चक्रों की पीठ का नाम देते हैं, और फ़िर नीचे की ओर आकर उन चक्रों का सृजन करती हैं जो विराट के शरीर में हैं। जब ये सारा कार्य हो जाता है तो वे मानव का सृजन करती है, परन्तु सीधे से (direct) नहीं - विकास प्रणाली के माध्यम से। वे विकास प्रणाली से गुजरती हैं और इस प्रकार से उत्क्रांति आरम्भ होती हैं। जल में छोटे से जीवाणु की उत्पत्ति होती है और उससे विकास प्रक्रिया आगे बढती है। तो जब वे जल का सृजन करती हैं और ब्रम्हान्डो का सृजन करती है तो इस सारी विकास लीला को करने के लिए पृथ्वी माँ को ही चुनती हैं तथा पृथ्वी पर ही इस सूक्ष्मदर्शी अणु की रचना करती हैं।"


- परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(कबैला, इटली, २६/०६/१९९८)



श्री माताजी निर्मला देवी