कृतयुग की विशेषता  


कृतयुग जब प्रकट होता है तो इसकी एक अन्य विशेषता भी है जिसके द्वारा बाह्य धर्मों का असत्य, सत्तारूढ़ लोगों के देश-विरोध एवं बेईमानी की स्वतः ही पोल जाती है. झूठ-मुठ के सभी पैगम्बर एवं पंथ -प्रमुखों की पोल खुल जायेगी तथा परमात्मा के नाम पर घृणा एवं असत्य फैलाने वाली संस्थाओं का कृतयुग में भंडाफोड़ हो जाएगा, क्योंकि इस काल में सत्य स्वतः प्रकट हो जाता है। सभी भ्रष्ट उद्यमी तथा झूठें गुरुओं का पर्दाफाश हो जाएगा।

कृतयुग में कष्ट भुगतने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, परन्तु यह हमारे अपने ही कर्मों का फल है जिसको हमें भुगतना होगा। यदि लोग योगवर्णित आत्मावस्था या परमेश्वरी शक्ति से एकाकारिता प्राप्त कर लें तो निःसंदेह इन कष्टों से
बचा जा सकता है। पूर्ण आध्यात्मिकता का मार्ग ही मानव के लिए एकमात्र सुख-प्रदायक मार्ग है इसे स्वीकार किए बिना कृतयुग में पोल खुलने की यह अभिव्यक्ति तथा दूरक्रम कर्मफल के माध्यम से घटित होता ही रहेगा। सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लोग जो कष्ट भुगतेंगे वे उनके कर्मफल के अतिरिक्त कुछ अन्य न होंगे, वर्तमान में उन्हीं की इच्छाओं का फल।

इस पक्ष के बावजूद भी वास्तविक गंभीर सत्य-साधकों के लिए कृतयुग सुखद काल है। कृतयुग में आत्मपरिवर्तन के अद्वितीय अवसर हैं। उत्थान को प्राप्त करके ये साधक अत्यन्त महान आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे।


- श्री माताजी निर्मला देवी

ध्यान धारणा किस प्रकार करनी चाहिए  

प्रातः काल उठें स्नान करके बैठ जायें। चाय यदि लेना चाहें तो ले लें , बातें न करें। प्रातः काल बिल्कुल बातें न करें, बैठ जाएँ और ध्यान करें। इस समय दैवी किरणे आती हैं, और उसके पश्चात सूर्योदय होता है। पक्षी भी इसी प्रकार जागते हैं और पुष्प भी। सभी इन दिव्य किरणों से जागते हैं। आप भी यदि संवेदनशील हैं तो आप महसूस करेंगे की सुबह उठने से आप अपनी आयु से दस वर्ष छोटे लगेंगे। प्रातः काल जागना इतनी अच्छी चीज़ हैं, और फिर स्वतः ही आप रात को जल्दी सो जायेंगे। यह जागने के विषय मैं है , सोने के विषय मैं मुझे बताने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि सो तो आप जायेंगे ही।

प्रातः काल आप केवल ध्यान करें। ध्यान मैं अपने को शांत करने का प्रयत्न करें। आँखें खोलकर मेरी फोटो को देखें और निश्चित रूप से अपने विचारों को शांत कर लें। विचारों को शांत करने के पश्चात ध्यान में जाएँ। विचारों को शांत करने के लिए "यीशु प्रार्थना " बहुत सहज चीज़ हैं क्योंकि विचारों की स्थिति आज्ञा स्थिति होती हैं। अतः प्रातः काल यीशु-प्रार्थना या श्री गणेशजी का मंत्र लेना याद रखें। दोनों एक ही बात है। आप ये भी कह सकते हैं, ''कि मैंने क्षमा किया। '' यह कार्य करता है और आप निर्विचार समाधि में चले जाते हैं। अब आप ध्यान करे। इस अवस्था से पहले ध्यान नहीं होता।

अतः सर्वप्रथम आप निर्विचार चेतना में चले जाएँ , तभी अध्यात्मिक उत्थान आरम्भ होता है। निर्विचारिता की अवस्था प्राप्त करने के पश्चात, इससे पहले नहीं। आपको यह जान लेना चाहिए, तार्किकता के स्तर पर आप सहजयोग में उन्नत नहीं हो सकते। अतः निर्विचार अवस्था में स्थापित होना पहली आवश्यकता है। अभी आपको महसूस होगा की किसी विशेष चक्र में रूकावट बनी हुई है , इसे भूल जाएँ, भुला दीजिये इसे।

अब आप समर्पण आरम्भ करें। कोई चक्र पकड़ रहा है तो आपको कहना चाहिए - "श्री माताजी मैं आपके प्रति समर्पित हूँ।"
अन्य विधियां अपनाने के स्थान पर आप केवल इतना कह दीजिये। यह समर्पण तर्कयुक्त नहीं होना चाहिए। तर्क युक्ति से अब भी यदि आप ये सोचते हैं कि "मुझे ऐसा क्यों कहना चाहिए " तो कहने का कोई लाभ न होगा। आपके हृदय मैं यदि पवित्रता औए प्रेम है तो यही सर्वोतम है। पावन प्रेम ही समर्पण है, अपनी सभी चिंताएँ अपनी माँ पर छोड़ दीजिये . .....।

फिर भी यदि कोई विचार आ रहे है या आपका कोई चक्र पकड़ रहा है तो बस समर्पण कर दें। आप देखोगे कि आपका चक्र साफ़ हो गया है। प्रातः काल आप इधर-उधर न होते रहें , अपने हाथों को भी बहुत अधिक न हिलाएं। आप देखोगे कि ध्यान से ही आपके अधिकतर चक्र साफ़ हो गए हैं। अपने ह्रदय को प्रेम से भरने का प्रयत्न करें और ह्रदय कि गहराई में अपने गुरु को विराजमान करने कि कोशिश करें। जब गुरु आपके ह्रदय में विराजमान हो जाएँ तो पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ उन्हें प्रणाम करें।

आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के पश्चात जो कुछ भी आप अपने मस्तिष्क से करते हैं वह मात्र कल्पना नहीं है। क्योंकि आपका मस्तिष्क, आपकी कल्पना सभी कुछ ज्योतिर्मय हो चुका है। अतः स्वयम को इस प्रकार बना लें कि अपने गुरु, अपनी माँ के श्री चरणों मैं नतमस्तक हो जाएँ। अब ध्यान-धारणा के लिए आवश्यक स्वभाव कि याचना करें। ध्यान- धारणा तभी होती है जब आपकी एकाकारिता परमात्मा से हो........।



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(१९-०१-१९८४)

ये जो शक्ति है, ये प्रेम कि शक्ति है  

ध्यान में गति करना, यही आपका कार्य है, और कुछ भी आपका कार्य नहीं है, बाकी सब हो रहा है। और आपमें से अगर कोई भी जब ये सोचने लगेगा कि मैं ये कार्य करता हूँ और वो कार्य करता हूँ, तब आप जानते हैं कि मैं अपनी माया छोड़ती हूँ और बहुतों ने उस पर काफ़ी चोट खायी हैं। वो मैं करुँगी। पहले ही मैंने आप से बता दिया है, कि कभी भी नहीं सोचना है कि मैं ये काम करता हूँ या वो काम करता हूँ। "हो रहा है।" जैसे "ये जा रहा है और रहा है।" अब सब तरह से अकर्म में - जैसे कि सूर्य ये नहीं कहता कि मैं आपको प्रकाश देता हूँ। "वो दे रहा है।" क्योंकि एकतानता में परमात्मा से, इतनी प्रचण्ड शक्ति को अपने अंदर से बहा रहा है। ऐसे ही आपके अंदर से 'अति' सूक्ष्म शक्तियां बह रही हैं क्योंकि आप एक सूक्ष्म मशीन हैं। आप सूर्य जैसी मशीन नहीं हैं, आप एक 'विशेष' मशीन हैं, जो बहुत ही सूक्ष्म है, जिसके अन्दर से बहने वाली ये सुन्दर धाराएं एक अजीब तरह कि अनुभूति देंगी ही, लेकिन दूसरो के भी अन्दर उनके छोटे-छोटे यंत्र है, माशीने हैं, उनको एकदम से प्रेमपूर्वक ठीक कर देंगे।


ये जो शक्ति है, ये प्रेम कि शक्ति है। इस चीज़ का वर्णन कैसे करुँ आप से? मनुष्य की मशीन जो है वो प्रेम से ठीक होती है। उसको बहुत जख्मी पाया है। बहुत जख्म हैं उसके अन्दर में। बहुत दुखीः है मानव। उसके जख्मों को प्रेम की दवा से आपको ठीक करना है। जो आपके अन्दर से बह रहा है, ये वाइब्रेशन सिर्फ़ "प्रेम" है। जिस दिन आपकी प्रेम की धारा टूट जाती है, वाइब्रेशन रुक जाते हैं।



- परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(स्रोत : 'चैतन्य लहरी' नवम्बर-दिसम्बर ०८)

ध्यान का समय  


सुबह उठके ध्यान करना बहुत आवश्यक है। जो लोग सवेरे उठ के ध्यान नही करेंगे, वह सहज में कितने भी कार्यान्वित रहें और सब कुछ करते रहे, अपनी गहराई वह पा नहीं सकते। तो फ़िर आपकी गहराई में ही सारा सुख समाधान है, सारी संपत्ति, ऐश्वर्य सभी कुछ उसी गहराई में है। उस गहराई में उतरने के लिये बीच की जो कुछ भी रुकावटें है उनको आपको निकल देना चाहिये। अपने पर प्रेम करके, अपनी और दृष्टी करके, अपने को समझ के की मेरे अंदर यह दोष है, इस दोष को मुझे निकाल देना चाहिये। दूसरो के दोषों की और बहुत जल्दी हमारी नज़र जाती है। यह काम आपका नही। मेरा काम है। यह आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिये। आप अपने दोषों की और देखें।

और उसके बाद शाम का ध्यान है। शाम के ध्यान में समर्पण होना चाहिये। तब फ़िर आगे की बात आती है कि आप किस तरह से समर्पित हैं। यानी के इस वक्त यह सोचना चाहिये कि मैंने सहजयोग के लिये क्या किया? आज दिन भर में मैंने सहजयोग के लिये कोनसा कार्य किया? मैंने सहजयोगियों के लिये कौन सा कार्य किया? शरीर से, मन से, बुद्धि से।


तो सवेरे का ध्यान अगर हम कहें की ज्ञान का है तो शाम का ध्यान भक्ति का है



- श्री माताजी निर्मला देवी

ध्यान कैसे करे?  




मैंने जैसे कहा है पहले अपने को प्रेम से भर लो। आप जानते हैं मैं आप की माँ हूँ । पूर्णतया आप इसे जानें की मैं आपकी माँ हूँ। और माँ होने का मतलब होता है की संपूर्ण Security है, संरक्षण है। कोई भी चीज़ गड़बड़ नही होने वाली। आप मेरी और हाथ करिये। और धीरे-धीरे से आँख बंद करके और अपने विचारों की और देखिये, आप निर्विचार हो जायेंगे। आपको कुछ करने का है ही नही। आप जैसे ही निर्विचार हो जायेंगे, वैसे ही आप अन्दर जाएंगे।

पहले अपने से इतना बता दो कि आज से निश्चय हो कि किसी को कोई सी भी चोट में नही पहुचाऊंगा। और सब को प्रभु तुम क्षमा कर दो, जिन्होंने मुझे चोट पहुचाई हो। और मुझे क्षमा करो क्योंकि मैंने दुनिया में बहुत लोगों पर चोट कि है।

आप जो भी कहेंगे वही परमात्मा आपके साथ करेगा। आप उस से कहोगे के "प्रभु शान्ति दो", तो वोह तुम्हे शान्ति देगा। लेकिन आप मांगते नही है शान्ति। "संतोष दो" तो वोह तुम्हे संतोष देगा, तो वोह आप मांगते नही है। "मेरे अन्दर सुंदर चरित्र दो" वोह चरित्र देगा।

अब प्रार्थना को अर्थ है क्योंकि आपका connection हो गया है परमात्मा से।

.... "मेरे अन्दर प्रेम दो। सरे संसार के लिए प्रेम दी " ... "मुझे माधुर्य दो, मिठास दो।" जो भी उनसे मांगोगे, वोह तुम्हे देगा। और कुछ नही मांगो। अपने लिए ही मांगो। "मुझे अपने चरण में समां लो"..... "मेरी बूँद को अपने सागर में समां लो।"

"जो भी कुछ मेरे अन्दर अशुद्ध है, उसे निकल दो।" परमात्मा से जो कुछ भी प्रार्थना में कहोगे, वही होगा..... "मुझे विशाल करो। मुझे समझदार करो।तुम्हारी समझ मुझे दो। तुम्हारा ज्ञान मुझे बताओ।"

"सरे संसार का कल्याण हो, सरे संसार का हित हो। सरे संसार में प्रेम का राज्य हो। उसके लिए मेरा दीप जलने दो। उसमे यह शरीर मिटने दो। उसमे यह मन लगने दो। उसमे यह ह्रदय खपने दो।"


सुंदर से सुंदर बातें सोच कर के उस परमात्मा से मांगे। जो कुछ भी सुंदर है, वोही मांगो तोह मिलेगा। तुम असुंदर मांगते हो तो भी वोह दे देता है। बेकार मांगते हो तो भी वोह दे ही देता है। लेकिन जो असली है उसे मांगो तोह क्या वोह नही देगा?

यूँ ही उपरी तरह से नही, 'अंदर से', आन्तरिक हो करके मांगो।


- श्री माताजी निर्मला देवी

श्री माताजी निर्मला देवी