प्रपंच और सहजयोग  

सर्वप्रथम प्रपंच शब्द का अर्थ देखते है : प्रपंच (प्र + पंच) में 'पंच' पाँच महाभूतों द्वारा निर्माण कार्य को बताता है| परन्तु इससे पहले 'प्र' आने के कारण इसका अर्थ परिवर्तित हो जाता है अर्थात पंच महाभूतों को जो प्रकाशित करता है वह 'प्रपंच' है|  

"अवघाची संसार सुखाचा करीन" (समस्त संसार सुखमय बनाऊंगा) तो यह सुख प्रपंच में प्राप्त होना चाहिए| प्रपंच छोड़कर अन्यत्र परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती| आम लोग 'योग' का अर्थ हिमालय पर जाकर तपस्या करना और ठण्ड से मर जाना लगाते हैं| यह योग नहीं हैं, हठ है - हठ भी नहीं मूर्खता है| महाराष्ट्र में जितने भी संत हुए वे सब गृहस्थ थे| उन्होंने प्रपंच किया| परन्तु 'दास बोध' (श्री रामदास स्वामी विरचित मराठी ग्रन्थ) के हर पृष्ठ में प्रपंच बह रहा है| प्रपंच के बिना आप परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते| यह बात उन्होंने अनेक बार कही है| प्रपंच त्यागकर परमेश्वर को प्राप्त करने की धारणा पिछले बहुत से वर्षों से हमारे देश में आई है क्योंकि गौतम बुद्ध प्रपंच त्यागकर जंगल में गए और उन्हें वहाँ आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ| परन्तु यदि वे गृहस्थ में रहते तो भी उन्हें साक्षात्कार होता| मान लीजिये हमें दादर जाना है, तो हम सीधे मार्ग से वहाँ पहुँच सकते हैं| परन्तु हम भिवण्डी जाएं, वहाँ से पूना जाएं और फिर कई और जगह घूमकर दादर पहुँचे| एक रास्ता सीधा है और दूसरा घुमावदार| घुमावदार मार्ग ही सच्चा है, यह बात ठीक नहीं है| उस समय क्योंकि सुगम को उन्होंने दुर्गम बना डाला तो क्या हमें भी ऐसा ही करना चाहिए? 'सहज समाधी लागो'| कबीर ने विवाह किया, गुरुनानक देव जी ने विवाह किया, राजा जनक से लेकर अब तक जितने भी बड़े बड़े अवधूत हो गए हैं वे सभी गृहस्थ थे| उसके बाद बहुत से ऐसे संत आए जो विवाहित न थे, परन्तु किसी ने भी विवाह संस्था को गलत नहीं कहा और न ही प्रपंच को गलत कहा| तो सर्वप्रथम हमें अपने दिमाग से यह धारणा निकाल देनी होगी कि योग प्राप्ति के लिए प्रपंच का त्याग आवश्यक है| इसके विपरीत यदि आप प्रपंच करते हैं (गृहस्थ जीवन में हैं) तो आपको सहजयोग में अवश्य आना चाहिए|

- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
 २९/११/१९८४

'जाती' अर्थात मानव की प्रवृत्ति  


हिंदू धर्म में माना जाता था की हर मनुष्य के ह्रदय में परमात्मा का प्रतिबिम्ब आत्मा के रूप में है। यदि ऐसा है तो किस प्रकार हम हिंदू समाज को भिन्न जातियों में बाँट संकते हैं? भारतीय सभ्यता के आरंभिक हजारों वर्षों में लोग मनुष्य के स्वभाव के अनुसार उसकी जाती मानते थे, 'जाती' अर्थात मानव की प्रवृत्ति। परमात्मा को प्राप्त करने की प्रवृत्ति वाले लोग 'ब्राम्हण' कहलाते थे। इन लोगों को पूर्णतः पावन तथा धन एवं सत्ता से विमुख होना पड़ता था। सत्ताकांक्षी लोगों को क्षत्रिय कहते थे। ये लोग अबोध, धार्मिक एवं दिन दुखी लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हुआ करते थे। व्यापार तथा धनार्जन में जिन लोगोंकी रूचि होती थी वे वैश्य कहलाते थे। चौथी प्रकार के लोगों को शुद्र कहा जाता था अर्थात निम्न-चेतना के लोग जो तुच्छ सेवाओं द्वारा एनी लोगों की सेवा करके धनार्जन करते थे। ये जातियाँ जन्म से न होकर व्यक्ति की प्रवृत्ति के अनुसार हुआ करती थी।


- श्री माताजी निर्मला देवी

विनम्र बने और शाश्वत सत्य को पा लें  

यह प्रेम आपके अंदर से फूट पड़ रहा है। इस प्यार को प्रसारित करने तथा इसे देने के विवेक का आनंद भी लें। देने में महानतम आनंद और प्रसन्नता है। लेने में कोई आनंद नही है।

कृपया विनम्र बनने का प्रयत्न करें। सर्वप्रथम अपने अंदर इस शाश्वत सत्य को पा लें। अपना शरीरयन्त्र परमात्मा को समझने का दिव्य उपकरण बनने दें। इधर-उधर से पढ़ी हुई चीजों के बहकावे में न आयें। संकीर्ण विचारों तथा अन्य लोगों का मजाक बनाने वाले मूर्खतापूर्ण अहम् से संचालित न हों। हे मानव! सूझ-बुझ प्राप्ति के इस महान अवसर के लिए स्वयं को जगाओ। ये प्रगल्भ शक्ति आपसे प्रसारित होने का प्रयत्न कर रही हैं। हमें इस विश्व को परिवर्तित करके सुंदर बनाना है क्योंकि सृजनकर्ता अपनी सृष्टि को कभी नष्ट नहीं होने देगा। परन्तु आप यदि सत्य को स्वीकार नहीं कर लेते तो आप स्वयं नष्ट हो जायेंगे। अतः माँ के रूप में एक बार पुनः मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि दिव्य सत्य को, परमेश्वरी प्रेम को, स्वीकार करें और एक हो जाएँ।



परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
(मुंबई, २१/०३/१९७७)


परमात्मा का योग बहोत आवश्यक हैं  

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भूत या भविष्य के बारे में जानने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। क्या आवश्यकता हैं? इससे क्या लाभ होता हैं? अपनी पूर्व गरिमा या पूर्व जीवन में, जो आज मूल्यहीन है, आपको किस प्रकार रूचि हो सकती है? परन्तु ये मानव की दुर्बलता है कि वह अपने व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जोड़ना चाहता है जो अत्यन्त बनावटी, अस्तित्वहीन और मूल्यहीन है। फ़िर वह कहता हैं कि मैंने ऐसा किया, मैंने ऐसा किया, मैं ऐसा कर पाया, मुझे कभी नहीं प्राप्त हुआ।


भारत में इस आज्ञा के कारण प्रायः लोग बाईं ओर को चले जाते हैं क्योंकि वह कहते हैं परमात्मा की पूजा करो। अब यदि इन्हे परमात्मा की पूजा करनी है तो उनका योग तो परमात्मा से हैं नहीं। देखें, कि माइक्रोफ़ोन से जब मेरा योग नहीं था तो मैं आप लोगों से बात नहीं कर पाई। अतः परमात्मा से योग प्राप्त किए बिना लोग परमात्मा की पूजा करने लगते हैं! वे सभी प्रकारकी आरतियाँ करते हैं, उपवास करते हैं, आदि-आदि, और स्वयं को सताते हैं!


- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(दिल्ली, भारत, ०३/०२/१९८३)


(बाईं और -> इडा नाड़ी)

आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं  

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अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना, पूजा का सार हैं। पूजा महत्वपूर्ण है परन्तु अपनी भौतिक कुण्ठाओं पर नियंत्रण किस प्रकार प्राप्त किया जाए? अपने लिए जब हमें कोई भौतिक पदार्थ कि इच्छा होती है तो हमें ये जान लेना चाहिए कि ये पदार्थ परमात्मा ने हमें प्रदान किया है। हर चीज़ परमात्मा कि हैं।


हम यदि परमात्मा को पुष्प अर्पण करते हैं तो पुष्प तो परमात्मा का ही सृजन है, हम क्या अर्पण कर रहे हैं? परमात्मा को हम दीप दिखाते हैं, या परमात्मा कि आरती करते हैं तो क्यों? ये प्रकाश भी तो परमात्मा का ही हैं! हम क्या करते हैं? परन्तु परमात्मा को प्रकाश दिखने से हम अपने अंदर कि प्रकाश की पूजा करते हैं। हमारे अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं। प्रकाश तत्व यहाँ-आज्ञा-तक हैं। जब आप आरती करते हैं या परमात्मा के सन्मुख दीपक जलाते हैं, जब आप परमात्मा को प्रकाश दिखाते हैं तो आपके अंदर प्रकाश-तत्व ज्योतिर्मय हो उठता हैं।


अब आप पुष्प अर्पण करते हैं तो मूलाधार ज्योतिर्मय हो जाता है। अब आप मधु अर्पण करते हैं तब आपका चित्त प्रबुद्ध होता है। तो क्यों हम ये सब परमात्मा को अर्पण करते हैं? आखिरकार परमात्मा को तो कुछ भी नही चाहिए। परन्तु परमात्मा भोक्ता (Enjoyer) हैं। आप भोक्ता नहीं हैं। आप भोग नहीं सकते। आपके अंदर परमात्मा भोक्ता हैं। जब परमात्मा वहां पर होते हैं तो वे आनंद उठाते हैं, अर्थात आत्मा। अतः आपकी आत्मा को जो चीज़ अच्छी लगती है उसका उपयोग पूजा-अर्चना करने के लिए करते हैं।


स्थूल से आत्मा की ओर जाना, ये वो चीज़ हैं जिससे आप चलते हैं क्योंकि पहले आप अपने chakron को ज्योतिर्मय करते हैं, चक्र ज्योतिर्मय होने पर आपके देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, और जब देवी-देवता प्रसन्न होते हैं तो कुण्डलिनी को ऊपर उठने का रास्ता प्राप्त होता है। मार्ग बन्ने पर कुण्डलिनी ऊपर उठती है और आपके चित्त का समन्वय आत्मा से होने लगता है। एक-एक कदम आप स्थूल पदार्थ से सूक्ष्म पदार्थ कि ओर बढ़ते हैं, सूक्ष्म पदार्थ से अपने चक्रों की ओर, चक्रों से अपने देवी-देवताओं कि ओर तथा देवी-देवताओं से आत्मा कि ओर।



- परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(लन्दन, २७/०९/१९८०)



श्री माताजी निर्मला देवी